सिवनीः श्री मां योगमाया कात्यायनी सिद्ध पीठ बण्डोल में विवाह योग्य कन्याओं के लिए षष्ठी पूजन आज

521 ज्योति कलशो से जगमगा रहा मां का भवन विवाह बाधा निवारण एवं सुयोग्य वर प्राप्ति हेतु सबसे सरल एवं अचूक साधन प्रतिवर्ष हजारों विवाह योग्य कन्यायें करती है पूजन
विवाह एक वर्ष के भीतर ही हो जाता हैं। मंगली आदि दोषों का भी शमन हो जाता है।
सिवनी, 30 सितम्बर। श्री मां योगमाया कात्यायनी सिद्ध पीठ बण्डोल में विवाह योग्य कन्याओं के लिए षष्ठी पूजन का आयोजन शनिवार 01 अक्टूबर को रखा गया है। इस बात की जानकारी मंदिर के व्यवस्थापक ने शुक्रवार की शाम को दी है।


उन्होनें बताया कि प्रति वर्षानुसार श्री माँ योगमाया कात्यायनी मंदिर बंडोल में नवरात्र महोत्सव पूरे धूमधाम से मनाया जा रहा हैं। प्रतिदिन मॉं भगवती का नयनाभिराम श्रृंगार एवं दिव्य आरती भक्तो को आकर्षित करती हैं मॉ भगवती योगमाया कात्यायनी देवी समस्त देवियों में सर्वाधिक सुंदर हैं ऐसी सौन्दर्य स्वरूपा के दिव्य भवन में मां के 320 तेल के ज्योति कलश एवं 201 घृत कलश जगमगा रहे है साथ ही 27 वर्षों से अखण्ड ज्योति मंदिर के गर्भगृह में प्रज्जवलित है जिसका नवरात्र में दर्शन का विशेष महत्व हैं।
इसी अनुष्ठान क्रम में वरार्थिनी कन्याओं एवं विशेष रूप से जिनके विवाह में बाधा आ रही है या विलंब हो रहा हो उनके लिए विशेष पूजन का आयोजन षष्ठी तिथि दिनांक 01 अक्टूबर 2022 शनिवार को किया गया है इस दिन प्रातः काल से ही वरार्थिनी (विवाह योग्य) कन्याओं एवं संतान अभिलाषी दम्पत्तीयों द्वारा मां भगवती का अर्चन एवं पूजन किया जावेगा।
हमारा अनुभव है कि यदि कोई भी वरार्थिनी कन्या इस षष्ठीं पूजन को पूर्ण विधिविधान एवं श्रद्धा से कर ले तो उसका विवाह एक वर्ष के भीतर अनायास ही हो जाता है। इस हेतु मंदिर में विद्वान ब्राहम्णों की विशेष व्यवस्था की गयी हैं पूजन प्रातः से शयन नीरांजन तक अनवरत चलता रहेगा कोई भी वरार्थिनी कन्या इस पूजन को कर सकती है इसके लिये किसी विशेष अनुमती अथवा दान आदि का बंधन नहीं हैं केवल श्रृंगार सामग्री एवं पूजन सामग्री साथ लेकर आयें।
श्री पं. राजकुमार शास्त्री जी, पं. हरसित दुबे जी एवं अन्य आचार्य व मंदिर पुजारी सतेन्द्र शास्त्री जी के विशेष मार्गदर्शन में उक्त पूजन कार्य सम्पन्न कराया जावेगा।

इस पूजन का पौराणिक वर्णन इस प्रकार है
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं में कुरू ते नमः ।।
अर्थ: हे देवि कात्यायनी आप महायोगीयों की अधीश्वरी देवी हैं हमें भगवान श्रीकृष्ण के सदृश पति प्रदान करने की कृपा करें।
श्रीमद् भागवत महापुराण में दशम स्कन्द के 22 वें अध्याय में ब्रज कुमारिकाओं के चीर हरण की श्रीकृष्ण लीला का मनोहर प्रसंग महामुनि श्री शुकदेव जी ने महाराज परीक्षित को सुनाते हुये नंद ब्रज की कुमारी कन्याओं द्वारा श्रीकृष्ण को वर रूप में प्राप्त करने के लिए जगदम्बा योगमाया कात्यायनी की पूजा के व्रत का विधान बताया है। मृगशिर के महिने में ब्रज की कुमारिकाओं ने विधिपूर्वक उस माँ कात्यायनी के व्रत और पूजन के फलस्वरूप श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त किया था।
सांप्रदायिकों का अनुभव है कि कोई भी वरार्थिनी कन्या इस कात्यायनी के पूजन और व्रत को विधि पूर्वक करे तो उसका विवाह शीघ्र ही अनायास हो जाता है एवं मंगली आदि दोषों का भी शमन हो जाता है जिन कन्याओं के माता-पिता कुलीन एवं श्रेष्ठ वर की खोज में बहुत लंबा समय व धन खो चुकने पर भी आशा और निराशा के समुद्र में तैरते डूबते रहे हैं तथा अपने माता-पिता की परेशानी देख-समझकर शिक्षित एवं वयस्क लड़कियों अपने जीवन को – अभिशाप समझने लगी हैं इनसे हमारा सानुरोध निवेदन है कि वे इस व्रत एवं पूजन को विधि पूर्वक सम्पन्न करें तथा कन्याओं के अभिभावकों से भी साग्रह निवेदन है कि वे अपनी कन्याओं से यह व्रत एवं पूजन करवायें।
हिन्दुस्थान संवाद

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