सिवनी, 27 नवंबर। श्री सद्गुरूदेव भगवान करते हैं आप सभी भक्त सप्तदिवसीय सत्संग समारोह में सायं कालीन बेला में प्रार्थना में शामिल हुये है। आप सभी भक्तों पर संकट मोचन श्री रावतपुरा सरकार की कृपा है।


हमारे जीवन में लक्ष्य का होना बहुत जरूरी होता है, बिना लक्ष्य के जीवन जीना उस व्यक्ति की तरह है, जो गाड़ी में बैठ तो जाता है, पर उसे उतरना कहां है यह पता नहीं होता। लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सबसे आसान तरीका है। व्यक्ति को निरंतर प्रयास करते रहना चाहिये, अपने जीवन में एक लक्ष्य बनाओ, उसके लिये अपना तन, मन, धन, सब लगा दो। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल हो जाते हैं, तो अपनी रणनीति को बदले बल्कि लक्ष्य को ना बदले। उक्ताशय के विचार भंडारपुर में चल रही श्रीमद भागवत कथा के दौरान श्री रावतपुरा सरकार द्वारा कही गई है।


आगे कहा कि मनुष्य को अपने ऊपर विश्वास होना कि हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही शांति से बैठेंगे, कोई भी लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं होता, हारा भी वहीं है जो कभी लड़ा नहीं, जो लोग असफलता की चिन्ता करते हैं, वो हमेशा असफल ही होते हैं, जो लोग असफलता की चिंता नहीं करते सफलता उनके कदम चूमती है। लक्ष्य के प्रति विश्वास होना चाहिए।
श्री सद्गुरू देव भागवान कहते है जीवन में मुस्कुराने की वजह स्वयं को ढूंढऩा पड़ता है, भाग्य के भरोसे न रहे। जीवन का आनंद मेहनत करने वाले ही उठाते है। बच्चों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये माता-पिता का मार्गदर्शन, उनका सहयोग बहुत जरूरी है। माता-पिता बच्चों को अपनी रूचि और क्षमता के अनुसार लक्ष्य चुनने की स्वतंत्रता दे। किसी तरह का दबाव बच्चों पर ना बनाये, क्योंकि क्षमता और रूचि के विपरीत लक्ष्य चुनने से बच्चा हमेशा तनाव में रहेगा, इससे वह अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पायेगा।
आगे बताया कि एक हजार वार प्रयास करने के बाद भी अगर तुम हार कर गिर पड़े हो तो एक बार फिर से उठो और जब तक ना रूको तब तक अपना लक्ष्य प्राप्त न कर सको। एक बार की बात है जब रात के अंधेरे में अर्जुन अपने लक्ष्य का निशाना लगाने में लगे हुये थे, तो अर्जुन ने प्रत्यंचा की टंकार सुनकर द्रोणाचार्य को बहुत आश्चर्य हुआ, उन्हें इसकी संभावना के बारे में अर्जुन से पूछा तो अर्जुन ने बोला गुरूवर रात के समय एक बार मैं भोजन कर रहा था, तभी तेज हवा चली और दीपक बुझ गया, किंतु अंधकार में भी हाथ को बिना भटके मुंह के पास जाते देखकर मैंने समझ लिया कि निशाना, लगाने के लिये प्रकाश की आवश्यकता नहीं, बल्कि अभ्यास की जरूरत है, अभ्यास का चमत्कार मानकर मैं रात को भी अभ्यास करता हूं। कहने का आशय है यदि हम भी लक्ष्य का संधान के लिये अर्जुन की तरह सतत अभ्यास करें तो सफलता हमारे कदम चूमेगी।

हिन्दुस्थान संवाद

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