सिवनी, 19 दिसंबर। जिले के शिक्षा विभाग के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय अरी में पदस्थ डॉ.दिनेश गौतम (विज्ञान शिक्षक) ने कंबल कीडे के जीवनचक्र पर अनुसंधान करते हुए नेपिटा कन्फर्टा एंड लेपिडॉप्टरिज्म एक किताब लिखी है जिसे माह नवंबर 21 में जर्मनी से प्रकाशित किया गया है। वहीं प्रकाशित इस पुस्तक के संबंध में उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलपति अखिलेश पांडे ने इस पुस्तक एवं लेखकों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस जीव की विशिष्ट लाइफ साइकिल, फीडिंग बिहेवियर, मेटामारफोसिस , लेपिडोप्टेरिज्म, भविष्य मे कीट -वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का मार्ग प्रशस्त करेंगी।


डॉ.दिनेश गौतम ने रविवार को हिन्दुस्थान संवाद को बताया कि कंबल कीड़ा, सिवनी एवं आसपास के जिलों मे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। ग्रामीण अंचलों में जुलाई-अगस्त-सितंबर महीनों में इस कीड़े का प्रकोप देखने को मिलता है। अक्सर यह कीड़ा घरों की छतों एवं खपरैल वाले मकानों में बहुतायत में देखने को मिलता है। इस कीड़े के बालों का त्वचा से संपर्क होने से बहुत तेज खुजली होने लगती है तथा त्वचा में दाने आ जाते हैं। इस पुस्तक के जीवनचक्र की खोज करने में डॉक्टर दिनेश गौतम शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय अरी(विज्ञान शिक्षक) एवं उनके सहयोगी बबीता गौतम, डीपी चतुर्वेदी कॉलेज सिवनी, महेश गौतम प्राचार्य शासकीय उत्कृष्ट स्कूल सिवनी का सहयोग उल्लेखनीय रहा है।


उन्होनें बताया कि इस कीड़े का वैज्ञानिक नाम नेपीटा कंफर्टा है यह नाम 1864 में वाकर नामक वैज्ञानिक ने दिया। किंतु इस विषय पर विशेष खोज नहीं की गई है। लगभग 150 साल बाद उन्होनें अपनेे सहयोगियों के द्वारा इस कीड़े का संपूर्ण जीवन चक्र नर एवं मादा तितली (मोथ) की पहचान, उनके संसर्ग काल, अण्डो से लारवा एवं मेटामारफोसिस के बाद बनने वाली मोथ पर अनुसंधान किया।


उन्होनें बताया कि इन कैटरपिलर्स के यूटरिकेटिगं बालों में टोमेटोपोईन रसायन होते है। जो त्वचा की कोशिकाओं से क्रिया करके खुजलाहट एवं एलर्जी उत्पन्न करते हैं। इन कैटरपिलर्स के मरने के बाद भी इनके बाल घरों में लंबे समय तक त्वचा की एलर्जी उत्पन्न करते हैं जिसे लेपिडॉप्टेरिज्म या स्किन डर्मेटाइटिस नाम से जाना जाता है। यह कैटरपिलर बरसात के समय घरों पर उगने वाली काई को खाते हैं तथा किसी फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते। आमतौर पर मनुष्य कैटरपिलर्स को मारने के लिए जिन रसायनों का उपयोग करते हैं उनसे अन्य लाभदायक कैटरपिलर्स की भी मृत्यु हो जाती है अतः इन्हें समाप्त करने के लिए मोथ की सही पहचान करके इन्हें जून-जुलाई महीनों में सरलता से नियंत्रित किया जा सकता है।


सहयोगी बबीता गौतम एवं महेश गौतम ने बताया की 150 साल पहले इस मोथ का जाति नाम एवं फैमिली नाम केवल रिपोर्ट कर ब्रीटिश म्यूजियम मे रख दिया गया था । जो जीवों के नामकरण की वैज्ञानिक पद्धति से मेल नहीं खाता अतः हम इसके पुनः नामकरण के लिए प्रयासरत है।


इस किताब को उन्होनें डॉ संध्या श्रीवास्तव प्राचार्य पीजी कॉलेज सिवनी, प्रो.डॉ एसके बाजपेई जबलपुर एवं पुष्पा गौतम को समर्पित किया है।
ज्ञात हो कि डॉ.दिनेश गौतम शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय सिवनी में पदस्थ प्राचार्य महेश गौतम के छोटे भाई है। वहीं इस पुस्तक से संबंधित तथ्यों को अनुसंधान करने में महेश गौतम, बबीता गौतम का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
हिन्दुस्थान संवाद

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