क्योंकि नारी महान होती है-नीलिमा मिश्रा

मन ही मन में रोती फिर भी बाहर से हँसती है बार-बार बिखरे बालों को सवारती है शादी होते ही उसका सब कुछ पीछे छुट जाता है

सखी – सहेली,आजादी, मायका छुट जाता हैअपनी फटी हुई एड़ियों को साड़ी से ढँकती है

स्वयं से ज्यादा वो परिवार वालों का ख्याल रखती हैसब उस पर अपना अधिकार जमाते वो सबसे डरती है।
शादी होकर लड़की जब ससुराल में जाती है भूलकर वो मायका घर अपना बसाती हैजब वो घर में आती है तब घर आँगन खुशियो से भर जाते हैंसारे परिवार को खाना खिलाकर फिर खुद खाती हैजो नारी घर संभाले तो सबकी जिंदगी सम्भल जाती है

बिटिया शादी के बाद कितनी बदल जाती है।


आखिर नारी क्यों डर-डर के बोलती, गुलामी की आवाज में,

गुलामी में जागती हैं, गुलामी में सोती हैं

दहेज़ की वजह से हत्याएँ जिनकी होती हैं जीना उसका चार दीवारो में उसी में वो मरती है।


जिस दिन सीख जायेगी वो हक़ की आवाज उठानाउस दिन मिल जायेगा उसके सपनो का ठिकानाखुद बदलो समाज बदलेगा वो दिन भी आएगाजब पूरा ससुराल तुम्हारे साथ बैठकर खाना खायेगालेकिन आजादी का मतलब भी तुम भूल मत जानाआजादी समानता है ना की शासन चलाना रूढ़िवादी घर की नारी आज भी गुलाम है दिन भर मशीन की तरह पड़ता उस पर काम है दुःखों के पहाड़ से वो झरने की तरह झरती हैक्योंकि नारी महान होती है।

संकलन कर्ता श्रीमति नीलिमा मिश्रा (तिवारी) शिक्षा विभाग सिवनी में लखनादौन विकासखंड में अध्यापिका है।

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