सिवनी, 25 फरवरी। गुरू रत्नेश्वर धाम दिघोरी में चल रही भागवत कथा का विश्राम 27 फरवरी को गीता उपदेश के बाद होगा। राजा परिक्षित के द्वारा सुनी गई श्रीमद् भागवत कथा से उन्हें अमरत्व की प्राप्ति कैसे हुई, इस रहस्य का वृत्तांत दो पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज शुक्रवार 26 फरवरी को निर्धारित समय पर बतायेंगे।

श्रीमद् भागवत कथा की पूर्णाहूति शनिवार 24 फरवरी को माघ पूर्णिमा के अवसर पर सुबह हवन के बाद पूरी होगी। इसी दिन महाराजश्री गीता का उपदेश सुनायेंगे। उसके बाद महाप्रसाद के रूप में भंडारा होगा, जिसमें मिष्ठान का भी वितरण किया जायेगा।


ज्ञातव्य है कि गुरू रत्नेश्वर धाम में अमृत कथा का समापन 25 फरवरी को होना था, लेकिन इस आयोजन को पहले एक दिन बढ़ाया गया और फिर दूसरे दिन माघ पूर्णिमा होने के कारण अनुष्ठान का समापन पूर्णिमा के दिन करने का निर्णय लिया गया।


महाराजश्री ने कहा कि जो कार्य जिस समय पर पूरा होना चाहिये वह उसी समय पर पूरा किया जाना चाहिये। महाराजश्री ने गुरूवार को भगवान कृष्ण के बाल लीलाओं का वर्णन करते हुये काली नाग को यमुना से निकालने अघासुर और बघासुर का वध करने के साथ ही गोवर्धन पूजा और उसके बाद गोकुल से मथुरा आने की कथा सुनाई। आपने मथुरा में उनके मामा के द्वारा कूटरचित यज्ञ का वर्णन करते हुये बताया कि पहले उन्होंने द्वार में हाथियों का वध किया और फिर कंस को उसके पापों से मुक्ति दे दी। कंस को मारने के बाद वे अपनी माँ देवकी से मिले और अपने मृत भाईयों को जीवित कर माता का दूध पिलाकर मोक्ष की प्राप्ति कराई।


महाराजश्री ने कथा के दौरान कहा कि सबसे बड़ा नाम क्या है? आपने कहा कि सद्पुरूषों का संग सबसे बड़ा नाम है। आपने कहा कि सद्पुरूषों के संग से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है। आपने कहा कि जीव और ईश्वर दोनों सखा हैं। भाई से भाई लड़ सकता है, लेकिन सखा ऐसा नहीं करता। सखा सुख और दुख में साथ निभाता है। हमने भले ही सारे दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लिये हों, लेकिन ईश्वर ने मुनष्य का कान खोल रखा है जिसके द्वारा भगवान का नाम श्रवण करने से हमारे दुख दूर हो जाते हैं। महाराजश्री ने श्रीकृष्ण के माखन चोरी का भी वृत्तांत सुनाया। आपने कहा कि अच्छी नियत से की गई चोरी चोरी नहीं होती है। भगवान कृष्ण भी दूध और दही कंस और उनके राक्षसी साथियों के लिये जाता था, उसे चुराकर ग्वाल बालों को हष्टपुस्ट करते थे, ताकि राक्षस कमजोर हो जायें। महाराजश्री ने कहा कि श्रीकृष्ण इतने चंचल थे कि उनकी चंचलता को निहारने के लिये गोपियां इंतजार करती थीं और उन्हें छेड़ती भी थीं। उनकी चंचलता इतनी अधिक थी कि वे कभी माखन में, कभी दूध में, कभी मिट्टी में तो कभी गोबर से अपने आपको सना लिया करते थे और यही चंचलता माता यशोदा को उलाहना मिलने के लिये होती थीं।
महाराजश्री ने कहा कि ईश्वर एक ही है, और वही अनेक है। कर्म की प्रधानता बताते हुये आपने कहा कि कर्म फलदाता है, कर्म करने से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है और उनसे साक्षात्कार होता है। आपने कहा कि सुदर्शन चक्र भगवान की आंख हैं, एक बार जब पूजा में कमल पुष्प कम पड़ गये तो उन्होंने अपनी आंख को कमल बनाकर प्रस्तुत कर दिया था।
महाराजश्री ने भगवान श्रीकृष्ण के बाल काल से लेकर कंस के वध तक की कथा का वृत्तांत सुनाया और कहा कि कंस का वध हो चुका है और यदि आप चाहें तो कथा का विश्राम यहीं किया जा सकता है और आगे बढ़ाना है तो कल राजा परिक्षित के द्वारा श्रवण किये गये श्रीमद् भागवत कथा के अमरत्व की प्राप्ति का रहस्य बतायेंगे, जिस पर उनकी बात को तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्वीकारोक्ति दी गई। महाराजश्री ने कहा कि अब श्रीमद् भागवत कथा का विश्राम माघ पूर्णिमा 27 फरवरी को हवन अनुष्ठान के साथ गीता उपदेश और भंडारे के साथ किया जायेगा।


सत्संग भवन और धर्मशाला के लिये 40 लाख देने की घोषणा
गुरू रत्नेश्वर धाम में बनने वाले सौ कमरों और दो बड़े हाल का निर्माण कार्य की घोषणा की गई है। कमरों के लिये दान-दाता अपने पूर्वजों के नाम पर कमरा बनाने की घोषणा कर रहे हैं। जहां पर उनके पूर्वजों के नाम के साथ दानदाता का नाम भी लिखा जायेगा। इस काम के लिये सिवनी विधायक दिनेश राय ने चल रहे वित्तीय सत्र में 20 लाख देने की घोषणा की है, जिसका सहमति पत्र दे दिया गया है। इसके बाद अप्रैल में नये वित्तीय वर्ष के समय 20 लाख और देने की घोषणा की गई। इस तरह सिवनी विधायक दिनेश राय ने गुरू रत्नेश्वर धाम में बनने वाले सत्संग भवन और धर्मशाला के लिये 40 लाख देने की घोषणा की है।


ज्योर्तिमठ की स्वर्ण जयंती के अवसर पर सम्मान
ज्योर्तिमठ की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आज उन लोगों का भी सम्मान किया गया जो कल शामिल नहीं हो पाये थे। इन लोगों में सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन, स्व. सीलबाबू की पुत्री नताशा और उनके दामाद राजा बघेल एवं दैनिक दल सागर के संपादक प्रमोद शर्मा ‘प्रखर’ को अपना आशीर्वाद दो पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज और उनके निज सचिव ब्रम्हचारी सुबुद्धानंद के द्वारा दिया गया।


हिन्दुस्थान संवाद

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